कर्तनालय से सलून तक

आईने के सामने ध्यान अनायास ही बालों की ओर चला गया. बालों की गिरती संख्या और घटते घनत्व पर चिंता हुई. साथ ही, पुराना ज़माना भी याद आ गया, जब फ़सल बिना खाद पानी के ही लहलहाती थी. फ़सल की याद आयी तो फ़सल काटने वाले किसान, अर्थात नाईयों का भी स्मरण हो आया.

मेरे जीवन में नाईयों का विकासक्रम, भारतीय समाज के विकास या यूँ कहिए कि पाश्चात्यीकरण के क्रम को दर्शाता है. वैसे तो यायावरी के चलते जगह जगह बाल कटवाए पर तीन नाईं अभी भी ज़ेहन में हैं.

परिवार में परंपरा थी कि बालक का पहला मुंडन तीन वर्ष की आयु में होता था. बच्चों की बाल कटवाने में विशेष रूचि नहीं होती और अगर शुरूआत देर से हो तो ये अरुचि कुछ ज़्यादा ही बढ़ जाती है. मेरे साथ भी कुछ ऐसा था. बाल न कटवाने का असहयोग आंदोलन, सर को ज़ोर ज़ोर से पटक कर,  जिसे पाश्चात्य संगीत में रूचि रखने वाले हेड बैंगिग भी कहते हैं,किया जाता था. घर और ननिहाल पास में थे तो अकसर यह ज़िम्मेदारी मेरे मामाओं को सौंपी या यूँ कहिए कि थोपी जाती थी.

मोहल्ले में एक ही नाई था जो घर में शादी ब्याह से लेकर भांग पीसने तक का सारा काम करता था. उसका नाम था बिसाल, विशाल नहीं. तब आज की तरह सलून नहीं केश कर्तनालय होते थे. कतरने के औज़ार ऐसे होते थे कि देखकर समझ न आए कि नाई है या कसाई. पुरानी लकड़ी की कुर्सी के हत्थों पर बिसाल एक पटिया लगाकर मुझे बैठा देता था और पानी का फ़व्वारा मारते हुए किसी मँजे हुए नेता की तरह वायदे करने लगता; “महाराज, आज बाल काटने दें. फिर शाम को मीनाबाजार जाएँगे, वहाँ मौत की छलाँग देखेंगे और क़ुल्फ़ी खाएंगे”. मैं भी भारत की भोली भाली जनता की तरह उस पर विश्वास करते हुए चुपचाप बैठा रहता. 

सरकार आने के बाद जनता के विश्वास की तरह मेरा भी उस पर भरोसा टूट गया. तब बिसाल के वादों की जगह धमकी ने ले ली; “ज़्यादा सर हिलाओगे तो कान कट जाएगा”. धमकी ने काम किया और धीरे धीरे मुझे बाल कटवाने की आदत पड़ गई. 

स्कुल जाना शुरू हुआ तो गृह नगर में ही यह काम निपटाया जाने लगा. पिताजी सब्ज़ी लेने जाते तो पास की ही दुकान में बैठा जाते. नाई का नाम नटवर था और वह पहले शहर की इकलौती तीन सितारा होटल में काम कर चुका था. नटवर की दुकान लेडीज़ व जेंट्स कटिंग सलून के नाम से थी. महिलाएँ ज़्यादा दिखती नहीं थीं. जो आती थीं, वे दबे पाँव आकर चुपचाप एक पर्दे के पीछे ग़ायब हो जातीं थी. पहली बार पर्दे की झीर्री से थ्रेडिंग की प्रक्रिया देखकर दिल दहल गया था. मन ही मन निश्चय किया कि अगर मेरी शादी हुई तो अपनी पत्नी को थ्रेडिंग कभी नहीं करने को बोलूँगा. 

धीरे धीरे १३-१४ साल की आयु में फ़िल्मी सितारों के जैसा हेयर स्टाइल रखने की लालसा हुई. तब मैं नटवर को उसकी ही दुकान में रखी पुरानी ‘मायापुरी’ या ‘माधुरी’ दिखाकर कभी सलमान या आमिर की तरह बाल सेट करने की माँग करने लगा. तब मानव अधिकार का दौर नहीं था और नटवर हर निवेदन को “पापा तुमको मारेंगे और मुझे डाँटेंगे” कर के वीटो कर देता. पढ़ाई में आगे बढ़े बालों पर से ध्यान हटता गया. हेयर स्टाइल तब अधिकतर मंटो की तरह ही रहा.

समय चक्र चलता रहा, और नाई बदलते रहे. नाई बदलने का सिलसिला क़रीब १० साल बाद जाकर रूका. कपिल नामक व्यक्ति ने अपने नाम से सलून खोला था. मैंने कपिल से बाल कटाना शुरू कर दिया. कपिल भारत की मुक्त अर्थव्यवस्था में अपने सलून की चेन बनाने के सपने देख रहा था. वह हेयर स्टायलिस्ट कम और अपने को व्यापारी की तरह अधिक देखता था. लिहाज़ा वह सलून में कम और मीटिंगों में ज़्यादा व्यस्त रहता था. इसी चक्कर में मैंने उसके ट्रेनी मंगेश से बाल कटवाने शुरू कर दिए. वो चक्कर ऐसा चला कि आज तक चल रहा है.

कपिल की आज अंतर्राष्ट्रीय चेन है, और मंगेश वहाँ सीनियर आर्ट डायरेक्टर है. पहुँचते ही चाय, काफ़ी, जूस आदि के लिए पूछता है. किसी टीवी पैनल के एक्सपर्ट की तरह वह मेरे बालों की दशा की एनालिसिस कर ग्रूमिंग प्रोडक्ट्स के सुझाव भी देता है. मैं सिर्फ़ इतना कहता हूँ; “यार जल्दी काटना, समय नहीं है”.

Anurag Dixit
Founding Member Lopak - @bhootnath

15 Comments

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