वामपंथ का होता सफाया

तमाम ओपिनियन पोल केरल में वाम मोर्चा को 5 से कम सीटें दे रहे हैं. वहीं सभी ओपिनियन पोल इस बात पर सहमत हैं कि पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा का खाता नही खुलने वाला है. त्रिपुरा से वैसे भी उन्हें कोई उम्मीद नही है. ऐसे में इस बात की पूरी संभावना है कि आसन्न लोकसभा चुनाव में वाम मोर्चा के तमाम घटक दल मिलकर भी 10 सीटें नही जीत सकेंगे.

बहुत पुरानी बात नही है जब दिल्ली की सरकारों का भविष्य वाम मोर्चा तय किया करता था. राष्ट्रीय मोर्चा और वाम मोर्चा ने मिलकर ही देश को एच डी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल जैसे नायाब प्रधानमंत्री दिए.

2004 के लोकसभा चुनावों में वाम मोर्चा को अभूतपूर्व सफलता मिली थी और इसने 59 लोकसभा सीटों पर विजय दर्ज की. मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल में तो वाम मोर्चा का दखल इतना अधिक था कि नेपाल में उन्होंने माओवादियों को गद्दी दिला दी.

शिवराज पाटिल यदि राष्ट्रपति नहीं बन सके और प्रतिभा पाटिल ने इस पद को सुशोभित किया तो इसका श्रेय भी वाम मोर्चा को ही जाता है. शिवराज के नाम पर वाम मोर्चा ने सिर्फ इसलिए वीटो कर दिया था क्योंकि वे धार्मिक हैं और अपनी आस्था का सार्वजनिक प्रदर्शन करने को भी गलत नही मानते हैं.

बहरहाल, वाम मोर्चा के अच्छे दिन बीत चुके हैं. 2009 के चुनाव में लेफ्ट को जबरदस्त धक्का लगा, जब लोकसभा में उनके सीटों की संख्या 59 से घटकर 24 रह गई. अगला झटका उन्हें पश्चिम बंगाल में लगा, जब 35 सालों से कायम लाल गढ़ ढह गया. फिर त्रिपुरा भी हाथ से निकल गया.

आज केरल में लेफ्ट की सत्ता तो है लेकिन जैसी राजनीतिक परम्परा रही है, अगले चुनाव में लेफ्ट वहाँ भी हार सकती है. केरल में लेफ्ट के सामने तेजी से आगे बढ़ रही भाजपा को भी रोकने की चुनौती भी है.

भारत में राजनीतिक मुख्यधारा से कम्युनिस्टों के पतन को तमाम लोग वैश्विक वामपंथी पतन से जोड़ कर देखते हैं. लेकिन यह आधी सच्चाई ही है. आखिर बिना विचारधारा के भी कांग्रेस 70 सालों से देश मे मौजूद ही है. और फिर 2004 में जब वाम मोर्चा को अभूतपूर्व सफलता मिली, तब भी कोई वामपंथ दुनिया मे उरूज पर तो नही था.

वामपंथी आंदोलन की सबसे बड़ी समस्या यह रही कि वे अपनी सारी ऊर्जा समस्याओं को चिन्हित करने में लगाते रहे लेकिन समाधान नहीं तलाश सके. पश्चिम बंगाल में वामपंथी शासन 35 वर्षों तक कायम रहा. इतिहास में कम ही राजाओं को इतना लंबा अरसा शासन करने के लिए मिला है.

लोकतंत्र में तो ऐसे शासक उंगलियों पर गिने जा सकते हैं, जिन्होंने 35 वर्षों तक शासन किया. लेकिन इसके बाद भी विकास के प्रत्येक मानक पर बंगाल पिछड़ता गया.

शुरुआती सालों में कृषि भूमि सुधार से वामपंथियों को पश्चिम बंगाल में समर्थन मिला लेकिन जल्द ही उद्योग धंधे चौपट होने लगे और असंतोष बढ़ने लगा जिसे दबाने के लिए कम्युनिस्ट सरकार ने दमन और हिंसा का सहारा लिया. लेकिन 35 वर्षों बाद ही सही, एक ऐसा दिन आया जब उनकी सत्ता उखड़ गई.

त्रिपुरा में भी यही हुआ. 25 वर्षों के कम्युनिस्ट शासन की उपलब्धि रही कि मुख्यमंत्री माणिक सरकार बेहद सामान्य तरीके से जीवन यापन करते थे और सब्जी भी खुद ही खरीदते थे. शायद माणिक सरकार ईमानदार रहे हों लेकिन उनकी ईमानदारी ने त्रिपुरा की जनता को कोई लाभ पहुँचाया हो, ऐसा नही लगता.

दूसरी समस्या यह हुई कि जब भी किसी राज्य में लेफ्ट सत्ता में आया, उस राज्य में हिंसा और लोगों की आवाज को दबाने के आरोप लगे. भारत ही नही, दुनिया में कहीं भी लेफ्ट शासन में रही हो, वहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक आजादी पर प्रतिबंध लगा.

दरअसल, मार्क्सवाद का जो वर्किंग मॉडल है, उसमें व्यक्तिगत आजादी के लिए जगह है ही नहीं. इसलिए यदि लेफ्ट कहीं भी सत्ता से बाहर जाती है तो लोग जो राजनीतिक वातावरण में फर्क देखते हैं और उसके बाद लेफ्ट की तरफ वापस नही जाते. 

वामपंथी दल भारतीय संसद में पहले की तरह वापसी कर सकें, इसकी संभावना बेहद कम है. वामपंथी विचारधारा को लेकर 60-70 के दशक तक जो आकर्षण था, अब वह नही रहा.

दुनिया को बदल देने का नारा अब युवाओं को आकर्षित नही करता. इसलिए वामपंथी बड़ी संख्या में नए कामरेड जोड़ सकें, इसकी संभावना कम ही है. यदी किसी तरह का कोई चमत्कार हो जाए तो ही लेफ्ट की वापसी हो सकेगी. लोकतंत्र में चमत्कार कभी कभी हो भी जाते हैं.

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