यूँ नहीं बन गए मोदी हिंदू हृदय सम्राट

श्वेता! मैं आशुतोष बोल रहा हूँ. मैं ये जानना चाहता हूं कि क्या ये आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है? क्या इस समय धर्म के नाम का इस्तेमाल सही है.

आज तक टीवी चैनल पर बैठे नेता से पत्रकार बने आशुतोष का यह सवाल आज तक की पत्रकार श्वेता तिवारी से था. उनके सवाल के पीछे की छटपटाहट सिर्फ उनकी नहीं बल्कि बहुत से लोगों की थी. सुबह प्रियंका बनाम मोदी का स्वप्न लिए लोगों को दोपहर तक पता चला कि इस बार भी मोदी के सामने कांग्रेस ने अजय राय पर दांव लगाया है. वह अजय राय जो पिछले लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनावों में एक बार अपनी ज़मानत ज़ब्त करवा चुके हैं और दूसरी बार हार चुके हैं.

2014 से पहले का समय होता तो हम बहुत आश्चर्यचकित होते. लेकिन 2014 के बाद वाली परिस्थितियों को देखने के बाद यह समझा जा सकता है कि आखिर मोदी के लिए यह छटपटाहट क्यों है. जिस विशाल जनसमर्थन को आज वाराणसी ने देखा है, वह अद्वितीय था. इसने विपक्षियों के सिर की त्योरियां चढ़ा दी. वहीं देश के तथाकथित सेक्युलर पत्रकारों को बहुत दुख हुआ. एक महोदय तो कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से भी ज़्यादा गुस्से में दिखे.

रोड शो में नरेंद्र मोदी का जनता से जुड़ाव स्पष्ट था. यही बात काशी से मोदी को एक मज़बूत उम्मीदवार बनाता है. आप ज़रा सोच कर देखिये की आखिर मोदी के सामने प्रियंका गांधी को उतारने का फैसला कांग्रेस ने क्यों लिया. वो नेता जिसके दम पर कांग्रेस अपना राजनैतिक उदय कराना चाहती थी, उसको ही सबसे कठिन सीट से चुनाव लड़ाने से रोक दिया गया. कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए कि पिछली बार केजरीवाल के पास प्रियंका और कांग्रेस से अधिक हिम्मत थी. उस प्रचण्ड मोदी लहर में हार जाना केजरीवाल की नियति थी. किसी की भी होती. लेकिन युद्ध जीतने के लिए पहले युद्ध में खड़ा होना पड़ता है.

प्रियंका गांधी द्वारा भी बहुत सी बातें कही गयी थी. बार बार यह बताने का प्रयास हुआ था कि वो बनारस से लड़ना चाहती हैं. लेकिन अजय राय का नाम सामने आते ही कईयों के मुंह उतर गए. मोदी के लिए भीड़ इतनी ज्यादा थी कि मोदी को दशाश्वमेघ घाट पहुंचने मे देर हो गयी. उनको गंगा आरती से वंचित होना पड़ा, लेकिन वो आचमन करने से खुद को रोक न पाए.

काशी का यही रंग है. वो जिसको अपनाती है, पूरे मन से अपनाती है. जिसको दुत्कारती है, उसका तो खुद भोलेनाथ ही भला कर सकते हैं. मोदी के लिए यह संदेश देना बहुत आवश्यक था कि भले ही विपक्ष अपनी एकता की बात करे, लेकिन सच्चाई यही है कि मोदी जैसे नाम के आगे उनके पास कोई नेता नहीं है. यह महागठबंधन वही बात को चींखकर बताता है.

एक संदेश और था. शायद आज़ादी के बाद पहली बार कोई प्रधानमंत्री अपने धर्म को इतनी सहजता से स्वीकार कर रहा है. हमने सेकुलरिज्म वाली राजनीति में कई बार भगवा रंग से प्रधानमंत्रियों की दूरी देखी है. भगवा से उनका ऐसा परहेज़ उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि को बचाये रखती थी. यही उनकी परिभाषा थी. मोदी ने उस भ्रम को तोड़ा है. मोदी ने समय समय पर यह दिखाया है कि अपने धर्म को आदर देश के संविधान का अनादर नहीं है. मोदी जी की यही सहजता वस्तुतः उनको हिंदू हृदय सम्राट बनाती है. 23 मई को कुछ अप्रत्याशित होने वाला है.

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