भारत की पुरानी राजनैतिक शुचिता की लाज रखता मोदी का इंटरव्यू

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अक्षय कुमार को एक इंटरव्यू दिया गया. अक्षय कुमार एक अभिनेता हैं. वो कोई पत्रकार नहीं है. यही बात कुछ सेक्युलर पत्रकारों को चुभ सकती है. मोदी से उनकी व्यक्तिगत कटुता कितनी भी हो लेकिन एक पत्रकार के लिए देश के वर्तमान प्रधानमंत्री का इंटरव्यू लेना उसके रेज़्युमे में एक बेहतर मील का पत्थर साबित हो सकता है. अफसोस यही है कि उन तथाकथित सेक्युलर पत्रकारों को वह मौका नहीं मिला इन पांच सालों में, वैसे वो एक गैर राजनैतिक इंटरव्यू ले भी न पाते. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि एक नेता से गैर राजनैतिक सवाल पूछना एक पत्रकार के लिए संभव नहीं हो पाता.

इन सब बातों से इतर अक्षय कुमार के सवाल ठीक वैसे ही थे जैसे एक आम नागरिक अपने प्रधानमंत्री से मिलकर पूछना चाहेगा. कुछ राजनैतिक सवाल अपनी जगह सही हैं लेकिन जब आपके सामने देश का प्रधानमंत्री खड़ा हो तो आप उसके जीवन के हर पहलू को जानने के लिए अधिक उत्सुक दिखेंगे. यही हाल अक्षय कुमार का भी था. अलादीन का चिराग वाला सवाल हो या फिर ट्विंकल खन्ना पर उनका कटाक्ष, मोदी और अक्षय कुमार के बीच में वो केमेस्ट्री साफ दिखी. यह विरले ही दिखाई देती है. देश के प्रधानमंत्री को नाराज़ करना कोई पत्रकार नहीं चाहता है. कड़वे सवाल पूछने की बातें और इसका दंभ बहुत से पत्रकारों द्वारा भरा जाता है लेकिन जब वो सामने ऐसा मौका पाते हैं तो ‘सास को खाने में क्या पसंद था’ से लेकर ‘आखिर फ़िल्म कौन सी देखी थी’ जैसे सवालों पर ही भटक जाते हैं. यह हम पूर्व में भी देख चुके हैं.

चाहें वह देश के प्रधानमंत्री रहे हो या प्रधानमंत्री को चलाने वाला रिमोट कहे जाने वाले व्यक्तित्व. यह लिखते हुए हमें भी दुख हो रहा है लेकिन एक ज़मीनी सच्चाई तो यही है कि हमारे देश में एक प्रधानमंत्री ऐसे भी रहे जिनको रिमोट कंट्रोल्ड कहा गया. इसने उनकी क्षमताओं से न्याय नहीं किया लेकिन वो यदि दस साल प्रधानमंत्री बने रहे तो इसी मजबूरी के कारण. 2014 का बदलाव सब कुछ बदलकर अपने साथ लाया था. महागठबंधनों और एक लूट्यन्स लॉबी की दयनीय स्थिति उसका उदाहरण है.

मोदी के इस गैर राजनैतिक इंटरव्यू ने मोदी के जीवन काल के सभी पहलुओं को छुआ. लेकिन इसने उन सोशल मीडिया के फ्रीलांसर पत्रकारों के ज़ख्मो को भी छू लिया तो आधे तथ्यों के आधार पर एक नैरेटिव बनाते हैं. उनका कोई भी एनालिसिस पूरा नहीं होता. यह समय समय पर सामने आता रहा है. एक मज़बूत पहलवान के सामने एक कमज़ोर पहलवान अधिक फेमस हो जाता है. शायद इसलिए भी क्योंकि वह एक धुरी के विपरीत खड़ा है. लेकिन जब सतह कमज़ोर हो तो पैर जल्दी लड़खड़ाते हैं. उनके भी पैर लड़खड़ा रहे हैं. एक सुपरस्टार को देश के प्रधानमंत्री का इंटरव्यू जिनको हज़म नही हो रहा है वो ज़रा एकबार कांग्रेस परिवार की पार्टियों में कपूर खानदान और बड़े घरानों की शिरकत को याद कर लें. वो 1975 का भी वह दौर याद कर लें जब उनकी क्रांतिकारी कलम एक बड़ी राजनैतिक विभूति के चरणों में समर्पित हो गयी थी. यही हाल यदि आज हो जाये, तो मोदी के साथ भाजपा का राजनैतिक भविष्य भी हमेशा के लिए समाप्त हो जाये. लेकिन इतना सबकुछ करने के बाद भी कांग्रेस के पास एक ऐसा चेहरा है जिसको वो प्रधानमंत्री बनाना चाहती है. इसी को किस्मत कहते हैं.

इस इंटरव्यू के अपने मायने निकाले जा रहे हैं लेकिन एक सच्चाई यह है कि अक्षय कुमार के जीवन में यह एक यादगार लम्हा होगा. वह इतिहास के पन्नों में एक ऐसे अदाकार के रूप में जाने जाएंगे जिसने देश के प्रधानमंत्री का इंटरव्यू लिया. वह सौभाग्य जो अपने पूरे जीवन में पत्रकारों की एक बड़ी टीम को नसीब नहीं होता. अक्षय कुमार इन समय सबसे प्रसन्न व्यक्तियों में से होंगे. जिन लोगों को इससे मिर्ची लग रही है उनके अपने कारण है. 23 मई 2019 को यदि भाजपा पूर्व बहुमत में आ गयी तो उसकी पीड़ा असहनीय हो सकती है. वैचारिक मतभेद हमेशा से हमारे देश में रहे हैं, लेकिन शिष्टाचार की जो महीन रेखा हमारे पूर्वजों ने खींची है वो मोदी ने इस इंटरव्यू में भी बनाये रखा. मोदी के लिए अपशब्द कहने वाली ममता बनर्जी द्वारा मोदी को कपड़े और मिठाई वाली बात सच में आश्चर्यजनक थी. उससे भी अधिक सुखद ये था कि मोदी ने इसका जिक्र किया. एक खुले दिमाग वाला व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है.

किसी ज़माने में नेहरू ने भी अटल बिहारी बाजपेयी की वाकशैली की तारीफ करते हुए कहा था कि यह लड़का बहुत आगे जाएगा. इसी राजनैतिक शिष्टाचार की कमी को आज हम महसूस करते हैं. मोदी ने इसको कायम रखा यह बहुत सुखद अनुभूति थी. देश के राजनेताओं के बीच यह शिष्टाचार बना रहे, यही हमारी कामना है. कम से कम चोर-चोर के शोर के बीच यह इंटरव्यू एक ठंडी हवा के झोंके की तरह आया जिसने उसी पुरानी राजनैतिक धारा की याद दिला दी जहां प्रतिद्वंदी भी देश की तरक्की का एक अहम साथी होता था. मोदी के प्रतिद्वंदी इसको कैसे देखते हैं, यह तो आने वाले समय में पता चलेगा. यहां बस इतना कहा जा सकता है कि इस इंटरव्यू ने राजनीति का एक और अध्याय लिख दिया.

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