चुनाव घोषणा पत्र: लिखा हुआ करके दिखाओ तो मानें

हमारे लोकतंत्र में कमियां ढ़ूँढ़ने वालों की कोई कमी नहीं क्योंकि आसमान की भले ही एक हद हो पर नैराश्य की कोई सीमा नहीं होती. चुनावी घोषणा पत्रों व चुनाव प्रचार के जिन हथकंडों से कुछ लोग लोकतंत्र के दूषित होने का दुखड़ा रोते हैं, वे आधे भरे गिलास को आधा खाली गिलास मानने वाले हैं. उन्हे हमारे माननीयों की जनोन्मुखता नहीं दिखती. कुछ माननीय जनता के हित चिन्तन में झूठा होने की कीमत पर भी दुबले हुए जा रहे हैं, कुछ जनता के मनोरंजन के लिए अथक परिश्रम कर रहे हैं. कुछ देश का भड़ास सूचकांक बढ़ाने के लिए आठों पहर योगदान दे रहे हैं.

चुनाव घोषणा पत्रों में असंभव से दिखने वाले वादों से बिदकना स्वयं में अलोकतांत्रिक है. गबरु प्रेमी अपनी अलहड़ प्रेमिका से भी तो असंभव वादे करता है; “मैं फूलों से, कलियों से, तारों से तेरी माँग भर दूँगा.” क्या कोई प्रेमिका ऐसे किसी मनुहार को लिटरली लेती है और सिर्फ इसी आधार पर प्रेमी का वरण कर लेती है? नेता जी के असंभव से वादे को भी मतदाता इसी स्पिरिट में लें और नेता जी का लोकतांत्रिक वरण सिर्फ वादे के आधार ही न करें तो बात बन सकती है.

पार्टियां चुनाव घोषणा पत्रों में आजकल अपनी सरकार बनने पर मुफ्त बिजली और पानी ही नहीं बल्कि साड़ी-धोती, लैपटॉप, आभूषण आदि भी देने का वादा करती हैं. आगे वे फिल्मों के टिकट, नेटफ्लिक्स का सब्सक्रिप्शन, डिजानर कपड़े जैसे विलासिता उत्पाद देने का वादा भी करेंगी.

आजकल बिना काम किए ही 72000/  प्रति वर्ष के निश्चित मासिक आय की भी चर्चा भी जोरों पर है. इन वादों के अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों पर चिन्तित न होइए. वादा करने से पहले पार्टी के अर्थशास्त्रियों ने गंभीर चिन्तन किया और वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि यदि जनता स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, सुरक्षा और उर्जा आदि का प्रबंध स्वयं कर ले तो पार्टी की बनने वाली सरकार के पास किए गए वादों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन होंगे. 

एक पार्टी का घोषणा पत्र आया है जिसमे सेना में जातिवाद के घालमेल की बात कही गयी है और वृहदतर सामाजिक न्याय के लिए शोषक सवर्णों पर अतिरिक्त कर लगाने की धमकी भी दी गयी है. इस घोषणा पत्र पर सेना को राजनीति में घसीटे जाने और जातिवाद भड़कने का रोना मत रोने लगिए, क्योंकि इस पार्टी के नहाने का अवसर ही नहीं आएगा, तो ये निचोड़ेगी क्या खाक. सहिष्षुणता सबके प्रति एक जैसी होनी चाहिए. देश में एक विधान, समान नागरिक संहिता और अयोध्या आदि संबंधी चुनावी वादों पर कुछ लोगों की भृकुटि तन जाती है. उन्हे साम्प्रादायिक वैमनस्य का भूत दिखने लगता है, कश्मीरियत और जम्हूरियत खतरे में पड़ने लगती है और अमन के श्वेत कबूतर काले ज्वर की चपेट में आ जाते हैं. ऐसे लोगों को भी रिलैक्स करने की जरुरत है. ये बातें दशकों से लिखी जा रही हैं. अब इसे लिखे जाने की रस्म बन चुकी है, कोरम पूरा होने दीजिए.

चुनाव घोषणा पत्र लोकतंत्र की अनेकता में एकता का एक उदाहरण है. जैसे कमोबेश लगभग सभी दल चुनाव घोषणा पत्र बनाते हैं और इस लिहाज से कम से कम एक कॉमन मुद्दा तो है इनके बीच. तो क्या हुआ जो राष्ट्रहित के मुद्दों पर ये एक नहीं हो पाते. लगभग सारे दलों के चुनाव घोषणा पत्र एक सुर में गरीबी और भ्रष्टाचार से लड़ने की बात करते रहे हैं, तरीके भले ही अलग हों. तो क्या हुआ जो गरीबी और भ्रष्टाचार अंगद की तरह पैर जमाए हुए हैं.

यदि गरीबी और भ्रष्टाचार इतने जिद्दी हैं तो इसका ठीकरा दलों पर नहीं फोड़ा जा सकता. यह ठीकरा हम भी उनके सिर फोड़ना छोड़ देंगे यदि वे एक दूसरे को इसके लिए दोषी बताना बंद कर दें. साथ ही, सभी दल दूसरों के घोषणा पत्र को सब्जबाग और अपने घोषणा पत्र को फलदार बगिया बताने से पहरहेज करें तो घोषणा पत्रों से होने वाली ट्रस्ट डेफिसिट थोड़ी कम होगी.

अलबत्ता, चुनाव घोषणा पत्र पर कुछ बातें तो खलती ही हैं. चुनाव घोषणापत्र आज वैसा फिजूल दस्तावेज बन चुका है जिसे बनाने वाले तक यह सोचते हैं कि बना ही क्यों रहे हैं. पढ़ने वाले सिर्फ वही होते हैं जिन्हे इसका महिमामंडन करके किसी की हवा बनानी होती हैं या इसमें मीन मेख निकालकर किसी का हित साधना होता है. मतदाताओं से चुनाव घोषणा पत्र पढ़वाओ तो जानें, लिखा हुआ करके दिखाओ तो मानें.

Rakesh Ranjan
दर्शन Surplus प्रदर्शन Deficit @rranjan501

76 Comments

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    September 5, 2019 - 5:03 pm

    You are my inspiration , I have few web logs and often run out from to post : (.

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    September 25, 2019 - 10:27 pm

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    Splendidly done go on like that. Indubitably you are the best.

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