बदलते जमाने संग बदलती रीत

बदलते जमाने के साथ हमें भी बदलना चाहिए, यही समय की रीत है. कलि प्रथम चरण में ताबड़तोड़ ऐसे एसे बदलाव हुए कि लोग हैरान-परेशान सोचते रहे और आसपास द्रुत गति से सब कुछ बदल गया. सत्तर के दशक में जन्मे लोगों को तो लग रहा है कि दुनिया अपने सारे रंग इनको दिखा कर ही दम धरेगी.

वो इकन्नी, दू पैसी,पाँच पैसी व पीली बीस पैसी या भारी सी चवन्नी पा लेने वाला बचपन और आज के कार्ड-मोबाइल पर वाले सुपरफास्ट समय के बीच उलझा मन हैरान परेशान खड़ा है. बीच वाला समय भी यादों के झरोखे में है ही.

एक रात में आँखें फाड़-फाड़कर, गाने फ़ॉर्वर्ड कर-करके वीसीआर पर तीन फ़िल्में देखने वाली किशोरावस्था और आज सैंकड़ों फ़िल्मों को बस रिमोट से बदलकर सर्फ़िग व स्ट्रीमिंग करता प्रौढ़ मन, परिवर्तन की सुपरसोनिक गति पर इतराता भी है और कभी अपने सफ़र के बदले अंदाज पर भरमाता भी है.

‘हमारे जमाने में…’ युग-युगांतर से चले आ रहे इस डायलॉग को सुनकर कुढ़ते हुए भी लिहाजवश चुप हो जाने वाले के मुँह से स्वत: यही बात निकलती है तो उम्र के नये पड़ाव का अहसास होता है. कभी कभी ये अहसास तनिक झटका भी देती है जब इस डायलॉग का खटाक से प्रत्युत्तर मिलता है; “ओह प्लीज़.. नॉट अगेन !”

बदलते समय की महिमा ऐसी है कि इस कलियुग में भी सच के समर्थक अपने धुर-विरोधियों द्वारा ‘भक्त’ कहे जा रहे हैं और अपने आप को चमचई से ‘पीड़ित’ की विशिष्ट उपमा से विभूषित कर रहे हैं. सोशल मीडिया के जिस प्लेटफ़ॉर्म पर बातों का ये जूतमपैजार चल रहा है, उसको वहीं पानी पी पीकर कोसते भी हैं पीड़ित जन.

काहे कि जिन पुरखों के ‘नाम पर’, ‘नाक पर’ वोट मिल जाया करते थे, अब लोग यहाँ थूर थूराकर बढ़ जाते हैं. शहज़ादे कुछ भी कहने को मुँह खोलते हैं, तो चमचों द्वारा बमुश्किल खड़ा किया गया ताश का महल भरभराकर गिर जाता है. एक-एक आदमी के हाथ में मोबाइल और नेट एक. हथियार है, ज़रा सा इधर का उधर हुआ नहीं कि मामला वायरल.

तभी बदलते मौसम के मिज़ाज के मद्देनज़र जनता-जनार्दन ख़ानदानी चश्मा ए चिराग़ शहज़ादे को मसखरा ए शहंशाह की उपाधि से सुशोभित कर चुकी है. सच में दुनिया आपादमस्तक बदल गई है. ‘सब चलता है’ से देश को पीछे धकेलते आने वाले हम ने अब ‘ये गलत है’ कहना सीख लिया है. ये परिवर्तन के दौर की सबसे ताज़ी बयार है, जिसने मन के वातायन के बंद कपाट खोट दिये हैं.

मेरे ऐसा करने से क्या फ़र्क़ पड़ेगा, ये कहनेवालों को लोग अब इतने उदाहरणों से लाद देते हैं कि वो हार मान ही लेता है. बेहतर है ना कि सुधर जाओ. हाँ, कुछ बेहद ढीठ प्रजाति के आकाओं से वेतन प्राप्त लोग भी होते हैं, जो ना कभी सुधरे हैं ना सुधरेंगें. तो इनको सुधारना चाहता भी कौन है, इनकी नफ़रतों भरी बातों के विरूद्ध ही तो लोग एक हुए हैं. ना ये विलेन होते और ना हमने अपने बीच के ‘हीरो’ को पहचाना होता.

अब गाँव की पुरानी कामवाली माताश्री को कहती हैं; “आवे के पहले एगो कॉल कर देथिन, तर-तरकारी ला के रखबन.” तब अहसास होता है कि परिवर्तन अब जड़ों तक जा पहुँची है. कभी ऊपरी तौर पर सब बदल जाता था, ग़रीब वहीं झोंपड़ी में चिथड़े समेटते रह जाता था.

आज सुविधायें हर तबके तक पहुँच रहीं हैं, तो भी कुछ लोग इस परिवर्तन पर बिफरे फिर रहे हैं, क्योंकि दादी-पापा के जमाने का फ़ेमस डायलॉग ‘हमें ग़रीबी रेखा मिटानी है’ छिन गया है. झोंपड़े अब पक्के मकानों में बदल रहे हैं, दिशा-मैदान की जगह अब टॉयलेट बन गये हैं.

बिजली-पानी, सड़क जैसी बुनियादी सुविधायें सर्वसुलभ हैं. इस भौतिक परिवर्तन से ज़्यादा मायने वो मानसिक परिवर्तन रखता है जो लोगों की सोच में आया है. मकान और टॉयलेट की सुविधा मिलने के बाद कामवाली ने माताश्री से कन्फर्म किया; “इ सब मोदीजी कैलखिन?” कामदार को पहचान मिली, लोगों में ये साहस आया कि उनका साथ दें.

यही परिवर्तन की बयार कभी-क़भार फ़ज़ीहत करवा देती है. हमारे कस्बे के सफ़ेद कुर्ता-पाजामा पहनने वाले एक कांग्रेसी नेताजी की बीवी ने भी अजियाकर एक दिन रंगीन कुर्ता पहनने को दे दिया. सौभाग्यवश या संयोगवश वह कुर्ता केसरिया रंग का था.

फिर क्या था, वह टॉक ऑफ़ द टाउन बन गये; “की छोड़ देल्हो पप्पूआ के? भाजपा कहिया ज्वाइन कैल्हो? इ कहिया से? एकदमे सही डिसीजन.” बेचारे सवालों से बचते-बचाते कुर्ता बदल आए पर एक दिन की लोकप्रियता से बड़े गदगद हुए और अब बदलते जमाने का जोश देखकर पार्टी बदलने की सोच रहे हैं.

Jaya Ranjan
Loves Reading, Writing & Travelling

8 Comments

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    दिल को छूकर निकल गया लेख ऐसा लगा कि मन के पटल से भावों को चुराकर पन्नों पर लिख दिया किसी ने

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