फिजूल का भय फैलाते बिना स्टैंड के बॉलीवुडिया बौने

2014 को एक बार फिर से रिपीट किया जा रहा है. खुद को एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री का सर्वेसर्वा समझने वालों ने फिर राजनीति में अपनी नाक घुसाई है.

वैसे जब इनसे पुलवामा, उरी, 26/11, आतंकवाद, जिहाद इत्यादि मामलों पर कुछ प्रश्न पूछो तो यह खुद को एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री वाला बोलकर किनारे हो जाते है. इससे एक स्पष्ट बात समझ मे आती है कि इनका कोई राजनैतिक स्टैंड नहीं है.

लेकिन ठहरिए! चुनाव आते ही उनका एक राजनैतिक स्टैंड भी सामने आ गया है. पिछली दफा भी था. नरेंद्र मोदी को हटाओ! कुछ भी करो, बस नरेंद्र मोदी को हटाओ! इसलिए बाकायदा ये लोग जनता से अपील भी कर रहे हैं. ये वही लोग हैं जिनका मुंह अंकित हत्याकांड पर नहीं खुला, चंदन की हत्या पर नहीं खुला.

डॉक्टर नारंग और प्रशांत पुजारी पर नहीं खुला. कश्मीरी पंडितों का मुद्ददा इनका एलीट ग्रुप अपनी तौहीन समझता है.

ऐसे लोगों के ग्रुप ने कहा है कि 2019 में संविधान बचाने के लिए वोट करें. यह वे स्टैंड अप कॉमेडियन्स कह रहे हैं जिन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को गाली देने के कारण ही अपना पूरा करियर संवार लिया है, वो अदाकारा कह रही हैं जिन्होंने टुकड़े-टुकड़े गैंग के कन्हैया कुमार के नामांकन के लिए उनको बधाई देते हुए उन्हे नए भारत का लीडर बताया है और जिनकी फिल्में एक गाली के बिना पूरी नहीं होती, जिनको इन पाँच सालों में सरकार विरोधी स्टैंड लेने के लिए मीडिया की हैडलाइन मिली है.

विडंबना देखिये, ये सब कह रहे हैं कि बोलने की आज़ादी छीनी जा रही. ये तो यह भी कह दें कि चुनाव नहीं होगा 2019 के बाद. इन सबके वीडियो को कांग्रेस पार्टी ट्वीट कर रही है.

यह वही पार्टी है जिसको बॉलीवुड के कलाकारों का मोदी के साथ सेल्फी बहुत खल रही थी. आज यही कांग्रेस पार्टी पूरा वीडियो बना कर ट्विटर पर डाल रही है और लुट्यन्स के क्रांतिकारी शांत है. यही बात अखर रही है. चलिए एक तो राजनैतिक पार्टी है तो उसका ऐसा करना स्वाभाविक है.

अपने धुर विरोधी के लिए उसका ऐसा व्यवहार समझ में आता है. परंतु जो दूसरे किनारे पर खड़े लोग हैं जिन्होंने किसी भी मुद्दे पर कोई स्टैंड नहीं लिया, वे जब ऐसी बातें अचानक करने लगे तो प्रश्न उठता है.

नंदिता दास, जीशान अय्यूब, तिग्मांशु धूलिया, स्वरा भास्कर इत्यादि जिस काल्पनिक भय को दिखा रहे हैं, वह चुनाव आयोग को भी देखना चाहिए. देश में भय का माहौल बनाने के बाद ऐसे वोट बटोरना कुछ चुनावी पार्टियों का ध्येय है लेकिन जब लाइट कैमरा एक्शन वाले राजनीति में उतर आए तो फिर उनसे सवाल पूछना बनता है, क्योंकि सारी जवाबदेही सरकार की ही नहीं होती.

यदि अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं होती तो आज उनका यह वीडियो भी नहीं होता. उनकी आवाज़ नहीं होती. उनका कोई चेहरा न होता. बस एक चीज़ होती, सन्नाटा! लेकिन उनका यह शोर देखकर उन्हें एक बार इमरजेंसी की याद दिलानी चाहिए जहां सच में आपके अधिकार छीन लिए गए थे जब 16 साल के लड़कों तक की नसबंदी की जा रही थी, जब सारे संवैधानिक मर्यादाएं ताक पर रख कर एक राजनीतिक विभूति की जी हुजूरी की जा रही थी.

आज तक इन लोगों ने उसका कोई जवाब नहीं मांगा है. और आज उसी पार्टी की आवाज़ बन कर ये देश की जनता का ओपिनियन बनाने में लगे हुए हैं. इसे ‘दोमुंहापन’ कहा जाता है.

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