लोकतंत्र के इर्द गिर्द एवं चुनावी परिदृश्य में अप्रैल फूल/ मूर्ख दिवस

यदि मूर्खता उपहास की विषयवस्तु होती तो उसे सेलिब्रेट करने के लिए एक दिवस निर्धारित नहीं किया जाता. दिवस भी कोई ऐसा वैसा नहीं बल्कि नये वित्तीय वर्ष का पहला दिन है. मूर्ख दिवस के लिए यह दिन चुनने का कारण शायद यह है कि व्यक्ति की आर्थिक स्थिति से उसकी मूर्खता का प्राय: सीधा संबंध होता है.

धन्ना सेठ चौपट भी हों तो सामाजिक लिहाज में उन्हे बुद्धिमान ही समझा जाता है, फटेहाल ज्ञानी के मामले में यह लिहाज गौण हो जाता है और लोग उन्हे मूर्ख मानने से नहीं हिचकते. हम सब ऐसा मानते हैं, बस कहते नहीं कि हम मूर्ख हैं. ‘मुझे मूर्ख समझते/ बनाते हो?’ का भावार्थ दरअसल यह है कि समझने या बनाने की जरुरत नहीं क्योंकि हम मूर्ख हैं ही. लोग यह देर-सबेर मान ही लेंगे कि दुनिया मूर्खों की है.

लोकतंत्र के कटु आलोचक लिंकन के परिभाषा की पैरोडी करते हुए इसे ‘मूर्खों का, मूर्खों द्वारा और मूर्खों के लिए’ शासन बताते हैं. यह निराशावादी परिभाषा हमारी आलोचना नहीं बल्कि एक कॉम्प्लीमेन्ट है. हम मूर्ख होते हुए भी विभिन्न शासन प्रणालियों का भवसागर पार करके श्रेष्ठतम प्रणाली लोकतंत्र के बैकुंठ पहुँच गये और वे चतुर होकर भी राजशाही और तानाशाही के जीवन-मरण चक्र की पैरवी कर रहे हैं. अलबत्ता, लोकतंत्र एक ऐसी शासन प्रणाली अवश्य है, जहाँ मूर्ख बनने और बनाने का स्कोप बहुत है. लोकतंत्र से संबद्ध सारे एक्टर इस गतिविधि में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं.

लोकतंत्र में मूर्ख बनाने का चक्र के तहत घोषणापत्र के वादों और मंच से किए गए लच्छेदार भाषणों से नेतागण पहले हमें फुसलाते हैं. हम भी एड़ा बनकर पेड़ा खाने की फील लेते हैं कि क्या पता नेता जी इस बार सच ही कह रहे हों. लेकिन हमारी यह फील चुनाव परिणामों के बाद कमजोर पड़ने लगती है. हम मन ही मन मुस्कुराते हैं कि ये हमें मूर्ख बना रहे हैं जबकि हम पहले से ही ऐसे हैं. चुनावों के समय चुनाव विशेषज्ञ और चुनावों के बाद विश्लेषक भी कुछ ऐसा ही करते हुए प्रतीत होते हैं. सामान्य दिनों में मीडिया हमें और नेताओं तक को मूर्ख बनाने की कोशिश करता है. वह कई बार सोशल मीडिया के सर्जिकल स्ट्राइक से स्वयं मूर्ख बनकर मूर्ख बनने और बनाने के चक्र में अपना योगदान सुनिश्चित करता है.

लोकतंत्र के सबसे प्रमुख एक्टर मतदाता को लोकतंत्र का सिरताज कहकर मूर्ख बनाने की प्रक्रिया सदैव चलती रहती है. मतदाता बार बार टूटे वादों के बावजूद अगले वादे पर यकीन कर लेता है. वह लगभग हर चुनाव के दौरान यह मान बैठता है कि व्यवस्था परिवर्तन दहलीज पर खड़ी है. चुनावों के बाद जब उसे यकीन हो जाता है कि व्यवस्था नहीं बदली, सिर्फ व्यवस्थापक बदले हैं तो मूर्ख बनने का चक्र पूरा हो जाता है.

मूर्ख क्रम में मतदाता जिन वादों पर यकीन कर लेता है, उसके लिए उसे नोबल पुरस्कार दिया जाना चाहिए. इन चुनावों में किया गया 72 हजार, 72 करोड़ या 72 हजार करोड़ का वादा स्वयं में 72 पुरस्कार पाने योग्य है. 20 सीटों पर चुनाव लड़ रही पार्टी भी देश में ध्रुव परिवर्तन करने का वादा करते हुए अपनी मूर्खता दिखाकर यथार्थवादी बनती है और हमें मूर्ख बनाकर गर्व करती है.

पांच सालों में सब कुछ कर गुजरने का दावा करने वाली सरकार भी हम पर तरस नहीं खाती और वादा करती है कि आगे भी बहुत कुछ करेंगे. कोई उनसे पूछो कि अब शेष ही क्या है करने को. वादों का मास्टर स्ट्रोक आना अभी बाकी है. गठबंधन के लिए सबकी तरफ से‘लगभग’ ना कहे जाने के सदमे से उबर तो लेने दीजिए जी. प्रधानमंत्री कौन होगा, न बताकर विपक्ष वादों में पिछड़ता दिखता है. कहीं इस बार बिना पीएम की ही सरकार देने का इरादा तो नहीं है?

मूर्ख बनाए जाने को मतदाता लोकतंत्र की स्पिरिट में लेता है और चुनाव के समय अपनी बारी आते ही वह फुल्ल फॉर्म में आ जाता है. वह सबकी चुनाव सभा में जाता है, हेलीकॉप्टर देखने और कॉमेडी का मजा लेने. कई बार तो वहाँ जाने के लिए वह दान-दक्षिणा भी ले लेता है. मूर्ख बनाए गए नेता जी समझते हैं कि उनकी लोकप्रियता कुलांचे मार रही है. ‘जवने हाथ तवने साथ’के तहत मतदाता किसी से धोती ले लेता है, तो किसी से गमछा और कुछ से नगद-नारायण. सबका खाकर सबका गाते हुए वह किसी नेता जी को मना नहीं करता; “भोट तs रउए के देब नेता जी.” वह सेफोलॉजिस्ट महोदय व चुनाव विश्लेषकों के पिछले सितम का बदला उन्हे गुमराह करके लेता है, इमली का बटन दबाना हो तो उन्हे आम बताकर. इन सबको मूर्ख बनाने के बाद मतदाता स्वयं को भी मूर्ख बना लेता है, जाति के नाम पर या कृत्रिम भावनात्मक मुद्दों पर या नकारात्मक मुद्दों पर वोट देकर.

व्यंग्य से परे हटकर कहें तो हमारा लोकतंत्र जीवन्तता की मिसाल है.

लोकतंत्र के प्रति निराशा से बाहर निकलिए. आइए, सबसे बेहतर विकल्प को चुनकर लोकतंत्र को और मजबूत करें. इसके तहत मेरे पास हाथधारी आएंगे तो हाथ के साथ की बात कहूँगा, साइकिल वाले से अपने साइकिलिंग की आदत का बखान करुँगा, हाथी मालिक से हाथी को शान को सवारी बताउँगा, झाड़ू वालों से प्यार जताकर अपना घर साफ करा लूँगा, फफकते लालटेन से सहानुभूति दिखाउँगा और मतदान में टशन के साथ फूल का बटन दबाते हुए सबको फूल बनाकर स्वयं कूल बन जाउँगा. आप भी सबकी सुनिए, मन से चुनिए.


दावा त्याग – लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. आप उनको फेसबुक अथवा ट्विटर पर सम्पर्क कर सकते हैं.

Rakesh Ranjan
दर्शन Surplus प्रदर्शन Deficit @rranjan501

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