चांद के पार भी ‘नेहरू नाम केवलम’

सुलवा सूत्र में गणित की कई अवधारणाओं को बनाने वाले पर बौधायन पहले व्यक्ति थे जिसे बाद में 800 ईसा पूर्व में पाइथागोरस थ्योरम के रूप में स्वीकार किया गया था. महावीरचार्य ने 850A.D में गणित सारा संघरा में अंश, बीजगणितीय समीकरण, श्रृंखला, सेट सिद्धांत, लघुगणक और प्रतिपादक का वर्णन किया. आर्यभट्ट ने 550 CE में शून्य की खोज की थी. सुश्रुत 600 ईसा पूर्व में सर्जरी कर रहे थे. वराहमिहिर ने 5 वीं शताब्दी में अपनी ब्राह्म संहिता में भूकंप के बादल का सिद्धांत दिया था. कणाद ने पहली बार 6 वीं शताब्दी में परमाणु कण का सिद्धांत दिया था. नागार्जुन ने अपने ग्रंथ में, स्वर्ण, चांदी, टिन और तांबे जैसी धातुओं के निष्कर्षण के तरीकों पर चर्चा की है. रामानुजन ने 1916 में अपना प्रसिद्ध अनुमान दिया. मेघनाद साहा ने अपने साहा आयनीकरण समीकरण में एक अभिव्यक्ति तैयार की जो 1920 में थर्मल संतुलन में एक गैस के आयनीकरण अवस्था से संबंधित है. बोस ने 1924 में बोस-आइंस्टीन कंडेनसेट का सिद्धांत दिया. सीवी रमन को 1930 में भौतिकी नोबेल मिला था. 1930 के दशक में द क्वांटम थ्योरी के विकास में होमी भाभा के योगदान ने प्रमुख भूमिका निभाई.

लेकिन इस देश को असली ज्ञान प्राप्त हुआ 1947 के बाद. जब देश के सिंहासन पर नेहरू जैसा विराट व्यक्तित्व विराजमान हुआ. भारत में टैलेंट बहुत पहले से था. परंतु उसका ज्ञान दिलाना तो आवश्यक था न? सचिन को जब तक मांजरेकर ने बताया नहीं कि बेटा तुम्हारे अंदर टैलेंट है, तब तक उसको कहां पता था कि वो टैलेंटेड है. वैसे ही धोनी को भी यदि कांबली नहीं बताता की बेटा तू सही खेल जाएगा तब तक धोनी को भी नहीं पता था कि कैप्टेंसी कैसे करते हैं. वो समझ तो 1947 के बाद ही भारत के वैज्ञानिकों के अंदर आई. भारत को 1947 के बाद नेहरू से वैज्ञानिक गुस्सा मिला जिन्होंने विज्ञान का अध्ययन तो नहीं किया था, लेकिन राजनीति के खिलाड़ी थे.

देश में न जाने कितने नेता आएंगे और चले जायेंगे लेकिन जवाहर लाल नेहरू की प्रासंगिकता सदैव बनी रहेगी. देश के अंदर ऐसा कोई नेता नहीं होगा जिसके घर से 3 प्रधानमंत्री निकले और चौथा लाइन में लगा हो. नेहरू की प्रतिभा का लोहा उस समय विश्व ने मान लिया जब वो खुद नेहरू होते हुए गांधी परिवार के वंशज बन गए.

निश्चित रूप से जवाहर लाल ‘नेहरू’ प्रकृति के नियमों से भी बाहर थे. यही उनको शेष नेताओं से अलग खड़ा करती है. उनकी मृत्य के 5 दशकों के बाद भी वो भारतीय राजनीति में अपना योगदान दे रहे हैं.

उनकी प्रासंगिकता का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा लीजिये कि वो आज टीवी चैनलों के एंकरों के भी प्रेरणास्त्रोत बने हुए हैं. हम तो कभी कभी कभी यह भी सोचते हैं कि भारत की उत्पत्ति आखिर हो कैसे गयी? शुश्रुत, भाभा, रमन, आर्यभट्ट की ‘लीगेसी’ के पीछे भी कहीं न कहीं नेहरू का हाथ अवश्य रहा होगा, क्योंकि किसी भी उपलब्धि के पीछे लगा प्रोत्साहन तो नेहरू का ही होता है.

उनके द्वारा लिखित भारत एक खोज यथार्थ की ज़मीन पर एक सत्य का चित्रण करती है. आर्यन बाहर से आये, यद्वपि इसका कोई सबूत नहीं है, लेकिन कब नेहरू जैसे प्रकांड विद्वान ने कुछ लिखा है तो सही ही होगा. इसरो द्वारा वर्तमान उपलब्धि का कारण भी नेहरू ही हैं. वो आज हमारे बीच भले न हो, लेकिन उनका परिवार…मतलब उनकी सोच आज भी हमारे बीच है.

विशेष: यह लेख श्री चंदन कुमार की फेसबुक पोस्ट से प्रेरित है.

दावा त्याग – लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. आप उनको फेसबुक अथवा ट्विटर पर सम्पर्क कर सकते हैं.

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