क्या हिन्दू खतरे में हैं?

चुनाव के शोर में एक बड़ी खबर आकर चली गई लेकिन किसी ने उस पर अधिक ध्यान नही दिया. खबर यह थी कि 20 मार्च, 2019 को समझौता एक्सप्रेस विस्फोट कांड में कांग्रेस सरकार द्वारा आरोपी बनाये गये स्वामी असीमानंद व अन्य 3 आरोपियों को न्यायलय ने सभी आरोपों से मुक्त कर दिया.

इसके साथ ही हिन्दू आतंकवाद का गुब्बारा पूरी तरह फूट गया जिसमें हिन्दुओं के लिए घृणा और षड्यन्त्र भरा था. हिन्दू आतंकवाद का मामला खत्म तो हुआ लेकिन यह अपने पीछे कई बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न छोड़ गया है. इसका सीधा उत्तर पिछली सरकारों में शामिल तीन-चार लोगों के पास ही होगा.

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि आखिर हिन्दू आतंकवाद की मनगढ़ंत कहानी बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी और इसका लाभ किन समुदायों या संस्थाओं को होना था. आप याद करें तो पाएंगे की पहली बार जब हिन्दू आतंकवाद या भगवा आतंकवाद का शिगूफा छोड़ा गया था, तब देश के सुरक्षा के हालात बेहद ख़राब थे. जयपुर, दिल्ली, बनारस, अहमदाबाद और मुंबई जैसे शहरों में लगातार आतंकी हमले होते रहते थे. ये सभी हमले निर्विवाद रूप से इस्लामिक अतिवाद का परिणाम थे.

ऐसे समय में जनता भी पूछने लगी थी कि सभी आतंकी एक समुदाय विशेष के ही क्यों होते हैं. ऐसे में समुदाय विशेष पर जो दबाव था, उसे कम करने का इससे अच्छा तरीका क्या होता कि बहुसंख्यकों हिन्दूओं को भी आतंक के मुद्दे पर पीड़ित की जगह षडयंत्रकारी करार दे दिया जाये. इसके दूसरे भी फायदे थे. आतंकी हिन्दू होगा तो हिंदुत्व की विचारधारा से प्रभावित होगा, यह प्रमाणित करना कोई मुश्किल काम नही है. उस समय की विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी जो सुरक्षा और आतंकवाद के मसले पर बेहद आक्रामक थी, उसे बैकफुट पर लाने का इससे अच्छा भला और क्या तरीका हो सकता था?

दूसरा प्रश्न यह है कि आखिर असीमानंद ही क्यों?

बंगाली परिवार में जन्में स्वामी असीमानंद पहले आरएसएस के स्वयंसेवक थे और बाद में उन्होने सन्यास धर्म को चुना. उन्होंने अपना कर्मक्षेत्र बनाया गुजरात के आदिवासी बहुल डांग जिले को जो उस समय पूरी तरह ईसाई मिशनरियों के कब्जे में था. यह स्वामी असीमानंद के अथक परिश्रम का ही परिणाम था कि डांग में न केवल धर्म परिवर्तन रुका बल्कि भारी संख्या में घर वापसी भी हुई. यह अनुमान लगाना कठिन नही कि कांग्रेस शासन में वे कौन ताकतवर लोग थे जो धर्म परिवर्तन के रास्ते मे अकेले खड़े स्वामी असीमानंद को पसंद नही करते थे.धर्म परिवर्तन के राह में बाधा डालने के कारण ही तो ओड़िशा में स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या हुई थी. जाहिर है कि स्वामी असीमानंद के लिए मौत से भी बड़ी सजा तय की गई थी.

सन 2011 में वामपंथी रुझान वाले अंग्रेजी पत्रिका ‘कारवाँ’ ने तो स्वामी असीमानंद का एक काल्पनिक इंटरव्यू ही छाप दिया जिसमें स्वामी असीमानंद ने न केवल अपना अपराध स्वीकार किया था बल्कि संघ प्रमुख तक को षड्यंत्र का हिस्सा बता डाला था. इससे पता चलता है कि यह षड्यंत्र कितना बड़ा था. लेकिन इसके परिणाम षड्यंत्रकारियों की अपेक्षा के अनुरूप नही रहे. 

हिन्दू आतंकवाद जैसी विसंगतिपूर्ण कल्पना को स्वीकार करने से वृहद हिन्दू समाज ने इनकार कर दिया और प्रतिक्रिया में एक अखिल भारतीय हिन्दू वोट बैंक तैयार हुआ. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस षड्यंत्र को अपने अस्तित्व पर हमला माना. नतीजा यह रहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 2014 के लोकसभा चुनाव में ऐसी भूमिका निभाई कि कांग्रेस को 70 वर्षों की सबसे खराब हार झेलनी पड़ी. कांग्रेस को तो उसके किये की सजा मिली. लेकिन हिंदुओं को इसकी कीमत लंबे समय तक चुकानी पड़ेगी. दुनिया के लिए यह सवाल तो बना ही रहेगा कि ये लोग निर्दोष थे या प्रमाण के अभाव में छोड़ दिए गए हैं. पाकिस्तान जैसा देश इस पर हल्ला हंगामा मचाता ही रहेगा.

राजनीति में विरोधी पक्ष पर तो आरोप प्रत्यारोप होते ही हैं.लेकिन कोई चुनाव जीतने के लिए देश को ही दांव पर लगा दे तो क्या कहेंगे? हिन्दू आतंकवाद के झूठे षड्यंत्र का नुकसान सिर्फ समुदाय को ही होना था या पूरे भारत को होना था. क्या हिन्दू और भारत को अलग करके देखा जा सकता है? यदि स्वामी असीमानंद को इस मामले में दोषी माना जाता तो भारतीय सन्त समाज की दुनिया मे कैसी छवि बनती? क्या इसके बाद भारतीयों की भी कपड़े उतारकर दुनिया के एयरपोर्ट्स पर जांच नही होती? क्या भारतीयों को इतनी सहूलियत से दुनिया भर में जाने आने के लिए वीजा मिलता?ये वो सवाल हैं जिनके जवाब तलाशे जाने चाहिए.

यदि मैं कहूँ कि हिन्दू समाज खतरे में है तो मुझे नफरत का सौदागर घोषित कर दिया जाएगा. कहा जायेगा कि जो हिन्दू मुहम्मद बिन कासिम, तैमूर, बाबर और अब्दाली से पार पा गया, वह अब खतरे में कैसे हो सकता है. बात तो सही है लेकिन आपके घर का जो दरवाजा चोरों, डकैतों, दंगाइयों से आपकी रक्षा करता है, उसमें भी अगर दीमक लग जाये तो उसे नष्ट होते देर नही लगती.

हिन्दू आतंकवाद का षड्यंत्र जिसने बुना, वह हिन्दू समाज पर चिपका हुआ दीमक है. उसे दूर भगाइये या अपना विनाश अपने आंखों से देखने के लिए तैयार रहिए.

दावा त्याग – लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. आप उनको फेसबुक अथवा ट्विटर पर सम्पर्क कर सकते हैं.

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