दुर्योधन की डायरी – गंगापुत्री दुशाला

“याचना नहीं अब रण होगा” कहकर केशव जा चुके हैं. पांडव और कौरव, दोनों ओर से युद्ध की तैयारियाँ आरंभ हो चुकी हैं.

दुर्योधन ने अधिकतर राजाओं को अपनी ओर मिला लिया था. ऐसे में पांडवों की ओर से लड़ने वाले अन्य राजा बहुत कम बचे थे. पांडवों की ओर से रणनीति बनाने का कार्य अर्जुन, धृष्टद्युम्न जैसे योद्धा कर रहे थे. उधर दुर्योधन की ओर से पितामह भीष्म, दुर्योधन, कर्ण, गुरु द्रोण जैसे महान योद्धा कर रहे थे.

कुछ एक राजा ऐसे थे जिनका पत्ता केवल इसलिए कट गया था कि वे बड़बोले थे. जैसे महाराज रुक्मि. पहले वे पांडवों के पास गए और बोले; “कौरव बड़े हलकट हैं. अधर्मी हैं. मैं अकेले ही कौरवों का नाश कर दूँगा. भीष्म से बड़ा योद्धा हूँ मैं. दुर्योधन और कर्ण को एकसाथ मरूँगा. मेरे समान योद्धा इस पृथ्वी पर नहीं है”

अर्जुन समझ गए कि ऐसे योद्धा को ना करना ही उचित होगा जो अपने सामने किसी को कुछ समझता ही नहीं.

फिर रुक्मि कौरवों के पास गए. बोले; “एक दिन में ही युद्ध जीत लूँगा. मैं कर्ण, दुर्योधन, पितामह से भी बड़ा योद्धा हूँ. मेरे समान योद्धा इस पृथ्वी पर आज कोई नहीं है”

दुर्योधन ने उसी क्षण लगभग मना कर दिया.

उधर मीडिया सूत्रों के हवाले पल पल युद्ध की तैयारियों की सूचना दिए जा रहा था. कि कैसे पांडवों की ओर युद्ध की तैयारियाँ चल रही हैं. सूत्रों के मुताबिक़ महाराज उडुपी को भोजन बनाने का कार्य सौंपा गया है और किस तरह का भोजन बन रहा है. कि सूत्रों के मुताबिक़ दुर्योधन ने गांधार से एक ऐसी गदा मँगवाई है जो हवा में ख़ुद उड़ उड़ कर लोगों को मारती है.

कुल मिलाकर कह सकते हैं कि मीडिया की रपटों की गाय पेड़ों पर चढ़कर घास चर रही थी.

लगभग समान रूप से तैयारी कर रहे दोनों ओर के लोगों के मन में प्रॉपगैंडा की सहायता लेकर एक-दूसरे को डराने की रणनीति पर भी चर्चा हो रही थी.

इस क्षण हस्तिनापुर राजमहल के षड्यंत्र कक्ष में  बैठक चल रही है. उपस्थित जनों में युवराज दुर्योधन, उप युवराज दुशासन, मित्रश्री कर्ण और मामाश्री शकुनि हैं. कुछ देर तक बातचीत हो चुकी है. अब आगे;

दुशासन; “मामाश्री, हमें युद्ध की तैयारियों पर दृष्टि तो रखनी ही है परंतु हमारी मीडिया का उपयोग करके ऐसा प्रॉपगैंडा भी फैलाना है जिससे पांडवों भयभीत हो जायें”

दुर्योधन; “दुशासन उचित कह रहा है मामाश्री. यह द्वापर है, त्रेतायुग नहीं कि मात्र धनुष-वाण, कृपाण और गदा से युद्ध लड़ा जायेगा. आप कृपया इस विषय में कुछ करें”

शकुनि; “तुम ठीक कह रहे हो भांजे. शत्रु को भयभीत करके आधा युद्ध जीता जा सकता है. मुझे चौपड़ के साथ साधना करने का किंचित समय दो भांजे.”

दुर्योधन; “आप साधना के लिए पर्याप्त समय ले लें मामाश्री परंतु रणनीति आउट ऑफ़ बॉक्स होनी चाहिए

शकुनि ने चौपड़ लेकर एक कक्ष में प्रवेश किया और तीन सौ सत्ताईस  क्षणों की साधना के पश्चात कक्ष से बाहर निकले तो मुख पर दार्शनिकों वाली रहस्यमयी मुस्कान थी. इधर दुर्योधन, दुशासन और कर्ण यह सुनने के लिए बेचैन थे कि मामाश्री क्या कहने वाले हैं. वे आए और बोले; “मैंने साधना से मार्ग निकाल लिया है भांजे”

दुर्योधन; “बताइए मामाश्री बताइए. मैं सुनने के लिए बेचैन हूँ”

शकुनि; “तो सुनो भांजे. अपनी साधना से मैंने मार्ग खोज लिया है भांजे. और मार्ग यह है कि हमें सूत्रों के हवाले से अपनी मीडिया में यह बात फैलानी है कि कौरवों द्वारा युद्ध के लिए बनाई जा रही रणनीति में भांजी दुशाला भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रही है”

दुर्योधन; “परंतु इससे क्या होगा मामाश्री? प्रजा में दुशाला की ईमेज भी कोई युद्धनीति के ज्ञाता की नहीं है. वह युद्ध करना भी नहीं जानती. उसके बारे में प्रजा बस इतना जानती है कि स्प्लिट पर्सनालिटी का शिकार जयद्रथ कभी-कभी उसे पीटता है और यह कि वह राखी के दिन हम सौ भाइयों को राखी बाँधती है.”

शकुनि; “यही तो उसका प्रबल पक्ष है भांजे”

दुर्योधन; “वह कैसे मामाश्री?”

शकुनि; “वह ऐसे भांजे कि जैसे ही पांडव यह सुनेंगे कि युद्ध की रणनीति में दुशाला का भी योगदान है, उन्हें शंका होगी क्योंकि उनके मन में यह बात आयेगी कि दुशाला ने युद्धकला कब सीखी? भांजे जिन्हें योद्धा के रूप में जाना जाता है उनकी युद्धकला के बारे में तो लोगों को पता रहता है और वे उसकी काट निकाल सकते हैं परंतु जिसे कभी किसी ने योद्धा के रूप में नहीं जाना उसकी युद्धकला का लगातार अनुमान लगाकर शत्रुपक्ष शंकित रहेगा और ऐसे में वह कमज़ोर होगा. एकबार हमारी मीडिया में यह बात फैल गई तब हम एक और बात फैलायेंगे”

दुर्योधन; “वह क्या मामाश्री?”

शकुनि; “वह यह भांजे कि भांजी दुशाला ने युद्धकला की शिक्षा अपने ननिहाल में रहकर महान योद्धा कटप्पा से ली थी जो कैकेयी के भी गुरु थे और त्रेतायुग से आजतक जीवित हैं. चूँकि कैकेयी को यह पृथ्वी युद्धकला की एक महान जानकार के रूप में पहचानती है तो यह बात लोगों के लिए विश्वास करने योग्य होगी. और तुम ये न भूलो भांजे कि कैकेयी भी गांधार से ही थी. फिर सूत्रों के हवाले से तीसरी अफ़वाह में हम दुशाला को गंगापुत्री बनाकर पेश करेंगे”

दुर्योधन; “परंतु उसका नाम गंगापुत्री क्यों रखेंगे मामाश्री?”

शकुनि; “तुम्हारी सेना में सबसे बड़ा योद्धा कौन है भांजे?”

दुर्योधन कुछ क्षणों के लिए सोचने लगा. शकुनि उसे देखते हुए बोले; “मुझे पता है भांजे कि तुम्हारे में मन में निज को सबसे बड़ा योद्धा बताने की बात आ रही है परंतु सत्य यही है कि कौरव सेना में गंगापुत्र भीष्म सबसे बड़े योद्धा हैं. ऐसे में  यदि भांजी दुशाला का नामकरण गंगापुत्री कर दिया जाय तो अर्जुन और भीम को लगेगा कि दुशाला सचमुच बड़ी योद्धा है और उनके मन में उत्पन्न होनेवाली शंका दोगुणी हो जायेगी और हम युद्ध जीतने की ओर बढ़ेंगे. और फिर भांजे, स्मरण करो कि द्वारका की प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में तुमने नारी सशक्तिकरण पर बड़ा लंबा-चौड़ा ज्ञान दिया था. अगर दुशाला को युद्धकला के जानकार के रूप में प्रस्तुत करोगे तो प्रजा के बीच तुम्हारी ईमेज भी सुदृढ़ होगी. स्मरण रहे कि भविष्य के हस्तिनापुर पर तुम्हें ही राज करना है भांजे”

दुर्योधन; “परंतु मामाश्री, दुशाला को गंगापुत्री बताना किसी भी छोर से तार्किक नहीं लगता”

शकुनि; “दुर्योधन, स्मरण रहे कि युद्ध और राजनीति में तर्क ढूँढनेवाले किसी किनारे नहीं लग पाते भांजे.”

दूसरे दिन हस्तिनापुर इक्स्प्रेस और टाइम्ज़ ऑफ़ हस्तिनापुर में हेडलाइन थी; “गंगापुत्री दुशाला आज करेंगी कुरुक्षेत्र का दौरा, पांडवों में शंका की स्थिति”

हेडलाइन पढ़कर केशव मुस्कुरा रहे थे. उधर भीष्म अपना सिर हिलाते हुए कह रहे थे; “यह नीति और धर्म के विरुद्ध है वत्स, यह नीति और धर्म के विरुद्ध है. स्मरण रहे वत्स कि……”

Shiv Kumar Mishra
Senior Reporter Lopak.in @shivkmishr

42 Comments

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    March 18, 2019 - 10:56 am

    क्या सुन्दर कल्पना आज के वास्तविक राजनीतिक घटनाओं पर आधारित है ।

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    निखिल रंजन
    March 18, 2019 - 12:50 pm

    बेजोड़

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    रंजना सिंह
    March 18, 2019 - 2:53 pm

    बेजोड़ कटाक्ष

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