भगत सिंह आज भी जिंदा हैं और सदा रहेंगे!

1857 की क्रांति के बाद से जब भारत के रणबांकुरों ने हथियार उठाना शुरू किया, उसी समय यह सिद्ध हो चुका था कि अब यहां से आज़ादी दूर नहीं है. आज स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी स्थितियाँ ऐसी बनाई गई हैं, जैसे हम वैचारिक रूप से परतंत्र हैं. यह देश के युवाओं  पर गंभीर प्रभाव डाल रही है. व्यवस्था से खिन्न उनका हृदय इस समय प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के भीतर विचाधाराओं की लड़ाई के बीच कुचला जा रहा है. इस देश की व्यथा भी यही है. जिस भगत सिंह के नाम पर आज भी क्रांति की बातें की जाती हैं, उसी भगत सिंह ने उस क्रांति के पीछे के तर्क भी दिए थे. आज बड़ी ही चालाकी से उन तर्कों को छुपाकर मात्र क्रांति वाली चाबुक से युवा मानस को हांका जा रहा है.

दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से जिस ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग की आवाज़ बाहर आई थी, वो भी एक क्रांति की ही बात करते थे. वामपंथ कभी व्यवस्था से संतुष्ट नहीं हुआ. आगे भी होने के ही आसार नहीं हैं, परंतु हर बात की काट क्रांति में रखना कितना तर्कसंगत है, यह जनता पर छोड़ देते हैं. आज भगत सिंह की पुण्यतिथि पर हम उसी एक विषय की तरफ जब पलट कर देखते हैं तो यह समझ में आता है कि स्वतंत्रता प्राप्त करना अंतिम लक्ष्य नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता उस एक बड़ी यात्रा की शुरुआत थी जिसे हम सभी भारतीयों को करनी है.

आज ही के दिन भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को अंग्रेज़ो द्वारा फाँसी पर चढ़ा दिया गया था. उनको निर्धारित समय से पहले फाँसी दी गयी. उस समय बापू जैसा विराट व्यक्तित्व भी देश में था. उस विराट व्यक्तित्व के समक्ष तीन युवाओं ने पूरे देश में अपनी फौज खड़ी कर दी थी. कदाचित उनका रास्ता हिंसा था, लेकिन यह कम समय में ही प्रभावशाली सिद्ध हुआ. अहिंसा बनाम हिंसा के मध्य विचारधाराओं का यह द्वंद बहुत पुराना है. भगत सिंह इस मिट्टी के वो लाल थे जिन्होने अपने हर कृत्य के पीछे तर्क का आधार रखा था. चाहें वो लाला लाजपत राय की हत्या का प्रतिशोध हो या फिर अंग्रेज़ी संसद में बम फोड़ना, उन्होंने कभी भी कोई कार्य युवा जोश के उबाल में नहीं किया, जैसा कि हमारे पूर्वज हमको बताते आये है.

भगत सिंह ने अपने अंतिम क्षणों में अपने नास्तिक होने के पीछे के भी तर्क दिए थे. उन्होंने बताया था कि मैं सर्वशक्तिमान परमात्मा के अस्तित्व को मानने से इनकार करता हूँ. मैं यह इसलिए नहीं कह रहा क्योंकि मैं अभिमानी हूँ, या मैं किसी ईश्वर का अवतार हूँ. मैं यह इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मैंने अपना जीवन एक मकसद के लिए न्योछावर कर दिया है. 

भावनाओ के इसी ज्वार में भगत सिंह यह भी कहते हैं कि आने वाले समय में जो भी व्यक्ति खुद को यथार्थवादी कहने का दावा करता है, उसको पुरानी मान्यताओं के सच को चुनौती देनी होगी. यदि आस्था तर्क के प्रहार को सहन न कर पाए तो वो बिखर जाती है. यहां अंग्रेजो का शासन इसलिए नहीं है क्योंकि ईश्वर यह चाहता है. अंग्रेज ईश्वर के माध्यम से हमें काबू में नहीं कर रहे हैं, बल्कि वो बंदूक और हथियारों के बल पर हमें काबू कर रहे हैं और हममें उसका विरोध करने की ताकत नहीं है क्योंकि हम बेपरवाह है.

भगत सिंह की ये बातें सिर्फ किसी विश्वास को ही चुनौती नहीं देती हैं अपितु यह उस सोच को भी चुनौती देती है जो आज हर चीज़ का हल क्रांति में खोजते हैं. ऐसे नए बाजार के क्रांतिकारियों को भगत सिंह का अध्ययन करना चाहिए. समाज में भगत सिंह यह संदेश देते हैं कि दूसरे के अंदर परिवर्तन खोजने से पहले खुद को परिवर्तित करने का भी साहस रखना चाहिए. भगत सिंह द्वारा मान्यताओं को चुनौती देने वाली बात को मात्र एक वर्ग विशेष तक सीमित रखने वालों ने भगत सिंह के विचारों को भी सीमित कर दिया है. निश्चित रूप से देश की बहुसंख्यक आबादी में बहुत से सुधार की गुंजाइश है, और उस आबादी ने वो सुधार किया भी है. लेकिन इसी के बीच देश के दूसरे वर्गों को नज़रंदाज़ किया गया जो आज भी अपनी धार्मिक मान्यताओं को लेकर जड़ बने हुए हैं. यही द्वंद का मुख्य कारण बनी है. 

किसी राष्ट्र के निर्माण में विचारधाराओं का परस्पर तालमेल ही उसके भविष्य को निर्धारित करता है. निश्चित रूप से विचारधाराओं के मध्य चलता हुआ द्वंद एक सर्वविदित तथ्य है. परंतु आज के समय हमें व्यवस्था से ज़्यादा सोच से लड़ने की आवश्यकता है. वो सोच जो राजनैतिक नफा-नुकसान के मध्य उपजी है.

खुद को भगत सिंह की विचारधारा का वंशज बताने वाले आज भगत सिंह के उसी तर्कसंगत प्रयास को बिसराये बैठे हैं जिसके आधार पर परतंत्र भारत के युवा भगत सिंह के साथ हो लिए थे. आज वह खुद को ही ‘इंट्रोस्पेक्ट’ नहीं करना चाहते हैं.

भगत सिंह ने क्रांति की मशाल को एक ज़िम्मेदारी के साथ प्रज्वलित किया था. वह भारत की अखंडता को सुदृढ़ बनाये रखने की ज़िम्मेदारी थी. आज के नए जन्मे क्रांतिकारियों ने उस मशाल को एक हाथ में उठा तो लिया है, लेकिन उनका दूसरा हाथ खाली है. इसी खालीपन को हम ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग के अंदर देखते हैं. डॉक्टर का काम मात्र बीमारियों का पता लगाना ही नहीं होता, बल्कि उसका इलाज भी होता है. और यहां हमारे नए क्रांतिकारी खुद एक बीमारी बने हुए हैं. उनसे उनका ही इलाज कैसे ढूंढा जाएगा? भगत सिंह पर विश्वास रखने वालों के दोनों हाथ भरे रहने चाहिए. तभी असली मायनो में हम भगत सिंह को श्रद्धांजलि दे पाएंगे. 

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