महाराणा राजसिंह – चारुमती

बादशाह आलमगीर औरंगज़ेब ने तुम्हारी बहन चारुमती की ख़ूबसूरती के बारे में बहुत सुनकर ये फ़ैसला किया है कि वह चारुमती साई से विवाह करेंगे. यह सुनकर किशनगढ़ रुप्पनगढ़ के राजा मानसिंह का चेहरा पीला पड़ गया. राजा मानसिंह से अब न कुछ बोलते बनता था न सुनते. घबराहट के मारे मानसिंह ने ये मंज़ूर कर लिया कि चारुमती का विवाह औरंगज़ेब से होगा. दरसल इस हाँ के पीछे जहांगीर बादशाह द्वारा निकाला गया एक फ़रमान था जिसके हिसाब से मुग़ल दरबार की इजाज़त के बग़ैर कोई राजा रजवाड़ा या रईस आपस में विवाह नहीं कर सकते थे. ज़ाहिर तौर पर यह फ़रमान मुग़ल सल्तनत की मज़बूती और रूपवती राजकुमारियों को अपने हरम में डालने के लिए निकाला गया था जिसका ख़ामियाज़ा आज मानसिंह भुगत रहे थे.

मुग़लों में विवाह की रीति जयपुर के राजा भारमल और भगवानदास द्वारा अपनी बेटियों का विवाह अकबर और जहांगीर से करने के बाद शुरू हुआ. मुग़लों में विवाह होने से रजवाड़ों की इज़्ज़त जाती रही थी. इसका सबूत इस बात से मिलता है कि मेवाड़ के महाराणा प्रताप सिंह ने जयपुर के राजा मानसिंह के साथ उदयसागर की पाल पर खाना खाने से मना कर दिया था. महाराणा अमरसिंह (महाराणा प्रताप के पुत्र) ने अपनी बहन और बेटियों के विवाह, जयपुर और जोधपुर के रजवाड़ों में इस शर्त पर किए कि अब इन परिवारों से बेटियाँ मुग़लों में नहीं ब्याही जाएंगी. रीवा के बघेलों ने भी बादशाह को प्रसन्न करके ये वचन लिया कि बहन बेटियों का विवाह मुग़लों में नहीं किया जाएगा. दरअसल मुग़लों में विवाह करने की रीत हिंदू राजाओं द्वारा मजबूरी में लिया गया फ़ैसला होता था.

जब मानसिंह ने घर आकर यह बात बताई कि राजकुमारी चारुमती की सगाई औरंगज़ेब से तय कर दी है तब श्रीनाथ जी के उपासक महाराज रूपसिंह और उनकी पुत्री राजकुमारी चारुमती के होश उड़ गए . राजकुमारी चारुमती ने मुसलमान बादशाह से विवाह करने से इंकार कर दिया. राजकुमारी चारुमती वल्लभ सम्प्रदाय के श्रीनाथ जी की उपासक थी, राजघराने में श्रीनाथ जी का उपासरा पहले से था. इन परिस्थितियों में श्रीनाथ जी मूर्ति तोड़ने का प्रयास करने वाले औरंगज़ेब से विवाह की कल्पना मात्र से चारुमती की नींद उड़ गई. राजकुमारी चारुमती ने अपने भाई और माता से कह दिया कि अगर मुसलमान बादशाह से मेरा विवाह करोगे तो मैं अन्न जल त्याग कर ज़हर खा लूँगी. इन परिस्थितियों में सिर्फ़ एक उपाय था कि कोई राजघराना ज़बरदस्ती आकर राजकुमारी चारुमती को ले जाए. परंतु हिंदुस्तान में उस वक़्त एक भी राजघराना ऐसा न था जो चारुमती से विवाह कर ले और आलमगीर से टक्कर ले सके, सिवाय महाराणा राजसिंह के.

महाराणा राजसिंह मेवाड़ के 58वें शासक थे. उनके पिता महाराणा जगतसिंह के समय से मेवाड़ मुग़ल सम्बंध ख़राब चल रहे थे और चित्तौड़गढ़ के क़िले पर बार बार मुग़लों के हमले होते रहते थे. महाराणा राजसिंह ने गद्दी सम्भालते ही मुग़लों और उनके करिंदो पर हमले तेज़ कर दिए. टीका दौड़ के नाम पर महाराणा राजसिंह ने बहुत से मुग़ल ठिकानों को लूट लिया, जिससे शाहजहाँ नाराज़ हुआ. शाहजहाँ की दुश्मनी आगरे के क़िले में मुग़ल बादशाह की क़ैद के साथ समाप्त हो गई. साथ ही दक्षिण में व्यस्त रहने के कारण आलमगीर औरंगज़ेब ने राजसिंह को बर्दाश्त करना सीख लिया था. इन सभी कारण से अंततः किशनगढ़ के राजपरिवार ने ये फ़ैसला लिया कि राजकुमारी चारुमती महाराणा राजसिंह को पत्र लिखे.

सबकी सलाह पर राजकुमारी चारुमती ने महाराणा राजसिंह को पत्र लिखा कि जिस तरह भीष्म राजा की बेटी रुक्मणी को ब्याहने दुष्ट शिशुपाल चढ़ आया और रुक्मणी की अर्ज़ी पर श्रीकृष्ण द्वारका से आज और शिशुपाल को हराकर रुक्मणी से विवाह किया, उसी तरह मुझे भी दुष्ट मुसलमान औरंगज़ेब के पंजो से बचाइए और मेरे धर्म और प्राणो की रक्षा करिए अन्यथा मैं ज़हर खाकर जान दे दूँगी और पाप आपके सर मढ़ा जाएगा.

कृष्णगढ़ के ब्राह्मण के हाथों राजकुमारी चारुमती का पत्र प्राप्त होते ही महाराणा राजसिंह एक बड़ी सेना लेकर कृष्णगढ़ चढ़ आए. कृष्णगढ़ पहुँचकर महाराणा राजसिंह ने राजा मानसिंह को एक महल में क़ैद कर लिया और राजकुमारी चारुमती से विवाह कर पुनः मेवाड़ आ गए.

इस विवाह ने औरंगज़ेब की नींद उड़ा दी. सभी को लगा कि अब बादशाह मेवाड़ पर चढ़ाई करेगा. परंतु बादशाह दिल से नाराज़गी के बावजूद इस बात को ज़्यादा तूल नहीं देना चाहता था. मामले को ज़्यादा तूल देने से फ़ज़ीहत होने का ख़तरा ज़्यादा था क्योंकि चारुमती की सगाई औरंगज़ेब से हुई थी और मंगनी की हुई राजकुमारी को महाराणा राजसिंह विवाह करके ले गए. इस ख़बर के फैलने से बादशाह की इज़्ज़त को ख़तरा था. अंततः औरंगज़ेब ने अपना ग़ुस्सा बचा कर रखा और कारवाई के तौर पर गियासपुर और बसावर मेवाड़ से छीन कर देवला के रावत हरि सिंह को सौंप दिया, जिसे महाराणा राजसिंह ने पुनः हासिल कर लिया। परंतु औरंगज़ेब और महाराणा राजसिंह की दुश्मनी अमर हो गई और समय बीतने के साथ दोनो के मध्य कई भीषण युद्ध हुए ।

लेखक : नीरज (@neerajs)

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Bhokal Times Editor @neerajs

30 Comments

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